जीवन का उद्देश्य

प्रश्न हमारे अनुभव को रेखांकित करता है फिर चाहे हम उसके विषय में सजगता से सोचें अथवा नहीं। जीवन का उद्देश्य क्या है? मैने इस विषय पर सोचा है और मैं अपने विचार उन लोगों के साथ बाँटना चाहता हूँ, इस आशा में कि वे उन लोगों के लिए प्रत्यक्ष और व्यावहारिक रूप से लाभदायक हो सके.
मैं यह मानता हूँ कि जीवन का उद्देश्य सुखी रहना है। जन्म के क्षण से ही, सभी मनुष्य सुख चाहते हैं, दुःख नहीं. न ही सामाजिक अनुबन्धन, न शिक्षा, न ही कोई सिद्धांत इसे प्रभावित कर सकते हैं. हमारे अंतर्मन से हम केवल संतोष की कामना करते हैं. मैं नही जानता कि इन अनगिनत आकाशगंगाओं, तारों, ग्रहों वाले ब्रह्मांड का कोई गहन अर्थ है अथवा नहीं, परन्तु कम से कम यह तो स्पष्ट है कि हम मनुष्य जो इस धरती पर रहते हैं, के सामने यह एक कठिन कार्य है कि हम अपने लिए एक सुखी जीवन बनाएँ. इसलिए इसका पता लगाना महत्त्वपूर्ण है कि कौन सी वस्तु अधिक से अधिक सुख दे सकती है.

आंतरिक शांति की अधिकतम मात्रा प्रेम तथा करुणा के विकास से आती है.दूसरों के प्रति एक सद्भाव का विकास करना अपने चित्त में स्वाभाविक रूप से चित्त को सहजता देता है. हममें जो भी भय अथवा असुरक्षा की भावना हो, उसे दूर करने में सहायक होता है. यह जीवन में सफलता का परम स्रोत है. हम इस संसार में जब तक जीवित हैं तब तक बाधाओं का सामना करना हमारे लिए अवश्यंभावी है.यदि ऐसे अवसरों पर हम आशा छोड़ कर निरुत्साहित हो जाएँ, तो हम अपनी कठिनाइयों का सामना करने की क्षमता को कम करते हैं.

अन्ततः प्रेम और करुणा सबसे अधिक सुख क्यों प्रदान करते हैं, उसका कारण है कि हमारी अपनी प्रकृति उसे सबसे अधिक सॅंजोती है. मानवीय अस्तित्व के मूल में ही प्रेम की आवश्यकता है. इसका कारण है एक गहन अंतर्निर्भरता की भावना, जो हम सबमें है. व्यक्ति चाहे कितना ही योग्य तथा कुशल क्यों न हो, उसे अकेले छोड़ दिया जाए तो वह जी नहीं सकता. कोई अपनी सम्पन्नता के जीवन काल में चाहे जितना बलशाली तथा स्वतंत्र क्यों न अनुभव करे, जब कोई बीमार होता है या फिर आयु में बहुत छोटा अथवा ढलती उम्र का होता है तो व्यक्ति को दूसरों के सहारे पर निर्भर होना ही पड़ता है. अधिक करुणाशील होने का प्रयास – अर्थात् हम दूसरों के दुःखों के प्रति सच्ची करुणा की भावना और उनकी पीड़ा दूर करने के लिए निश्चय की भावना का विकास कर सकते हैं.परिणामस्वरूप, हमारी अपनी शांति और आंतरिक शाक्ति अधिक होगी.

आजकल कई बच्चे दुःखभरे घरों में बड़े होते हैं. यदि उन्हें ढंग का प्यार नहीं मिलता, तो अपने आगामी जीवन में वे शायद ही अपने माता पिता से प्रेम करेंगे और संभव है दूसरों से प्रेम करना उनके लिए कठिन होगा. यह बहुत शोचनीय है.यदि कोई मानवीय संवेदनाओं से भर कर बोलता है तो उसे सुनने में हमें आनंद आता है और हम उसी के अनुसार प्रतिक्रिया देते हैं; पूरी बातचीत दिलचस्प हो जाती है, फिर चाहे वह विषय कितना ही कम महत्त्वपूर्ण क्यों न हो. दूसरी ओर, यदि कोई व्यक्ति बहुत ही भावशून्य होकर या फिर बडे ही कर्कशता से बोलता है, तो हम अशान्त से हो जाते हैं और चाहते हैं कि वह उस बातचीत को शीघ्र ही समाप्त कर दे. छोटी से छोटी घटना से लेकर सबसे महत्त्वपूर्ण घटना में भी दूसरों के लिए प्रेम और सम्मान हमारे सुख के लिए महत्त्वपूर्ण है.


मेरा विश्वास है कि कोई भी प्रेम की आवश्यकता का अभाव लेकर पैदा नहीं होता और इससे यह प्रदर्शित होता है कि यद्यपि आज की कुछ विचारधाराएँ इस ओर प्रयास कर रही है पर मनुष्यों को मात्र भौतिक रूप से परिभाषित नहीं किया जा सकता। कोई भी भौतिक वस्तु फिर चाहे वह कितनी ही सुन्दर या मूल्यवान क्यों न हो, हममें प्रेम की भावना नहीं भर सकती क्योंकि हमारा गहन अस्तित्व और सच्चा चरित्र चित्त के व्यक्तिपरक प्रकृति में निहित है. हम चाहे इस बात के प्रति सजग हों अथवा ना हों, परन्तु जिस दिन से हम पैदा हुए हैं, मानवीय प्रेम के प्रति हमारी आवश्यकता हमारे रक्त में है.

कुछ लोग कहते हैं जहाँ प्रेम और करुणा अनोखी तथा अच्छी है पर वास्तव में उनकी कोई प्रासंगिकता नहीं है. उनका कहना है कि हमारा संसार ऐसा स्थान नहीं है जहाँ ऐसे विश्वासों का बहुत अधिक प्रभाव अथवा शक्ति हो. उनका दावा है कि क्रोध तथा घृणा मानवीय स्वभाव के ऐसे अंग बन चुके हैं कि वे सदा मानव समाज पर हावी होते रहेंगे. मैं इससे सहमत नहीं हूँ. हम मनुष्य इस रूप में सैकड़ों हज़ारों वर्षों से हैं. मेरा विश्वास है कि यदि इस दौरान मनुष्य का चित्त मुख्य रूप से क्रेाध तथा घृणा के वश में होता तो हमारी कुल जनसंख्या कम हो जाती.। परन्तु हमारे सभी युद्धों के बावजूद, हम पाते हैं कि मनुष्य की जनसंख्या पहले से कहीं अधिक है. इससे मुझे स्पष्ट होता है कि संसार में प्रेम तथा करुणा प्रबल है.

करुणा मानसिक लाभ के साथ अच्छे स्वास्थ्य में भी योगदान करता है. मेरे निजी अनुभव के आधार पर मानसिक दृढ़ता तथा अच्छे स्वास्थ्य का सीधा संबंध है. इसको लेकर कोई प्रश्न ही नहीं उठता कि क्रोध तथा बेचैनी सबसे बड़ी बीमारी हैं और कमज़ोर बनाती है. दूसरी ओर यदि हमारा चित्त शांत हो और सकारात्मक विचारों से भरा हो तो शरीर बहुत सरलता से रोग का शिकार नहीं बनता.

परन्तु यह भी सच है कि हम सबमें एक आंतरिक आत्म केन्द्रितता है जो हमें दूसरों के प्रति प्रेम व्यक्त करने से संकुचित करती है. इसलिए चूँकि हम सच्चा सुख चाहते हैं जो कि केवल एक शांत चित्त से आता है और चूँकि इस प्रकार की मानसिक शांति केवल एक करुणापूर्ण प्रवृत्ति से आती है, तो हम इसका विकास किस प्रकार से कर सकते हैं? स्पष्ट है कि हमारे लिए केवल यह सोचना पर्याप्त नहीं है कि करुणा भाव कितनी अच्छी है. हमें उसके विकास के लिए एक गहन प्रयास करना होगा. अपने विचारों तथा आचरण में परिवर्तन लाने के लिए हमें अपने दैनिक जीवन की सभी घटनाओं को काम में लाना होगा.

सबसे पहले तो हममें इस बात को लेकर स्पष्टता होनी चाहिए कि करुणा से हमारा तात्पर्य क्या है. कई प्रकार की करुणात्मक भावनाएँ इच्छाओं तथा मोह से मिली होती है. उदाहरण के लिए माता पिता अपने बच्चों के प्रति जिस प्यार का अनुभव करते हैं उसमें अकसर उनकी अपनी भावनात्मक आवश्यकताएँ होती है. इसलिए वह पूरी तरह से करुणाशील नहीं है.फिर वैवाहिक जीवन में भी पति तथा पत्नी के बीच का प्रेम-खासकर प्रारंभ के दिनों में, जबकि वे दोनों एक दूसरे के चरित्र के बारे में अच्छे से नहीं जानते-सच्चे प्रेम के स्थान पर अधिकतर मोह पर निर्भर करता है. हमारी इच्छाएँ इतनी प्रबल होती है कि जिस व्यक्ति के प्रति हमारा मोह है वह हमें अच्छा प्रतीत होता है, जबकि वास्तव में वह बहुत ही नकारात्मक होता अथवा होती है. इसके अतिरिक्त हममें छोटे सकारात्मक गुणों को बढा चढ़ा कर कहने की प्रवृत्ति होती है. इसलिए जब एक साथी की प्रवृत्ति बदलती है तो दूसरा साथी भी अकसर निराश हो जाता है और उसकी प्रवृत्ति भी बदल जाता अथवा जाती है. यह इस बात का संकेत है कि प्रेम दूसरे व्यक्ति के प्रति सच्ची चिंता के बजाय वैयक्तिक आवश्यकताओं से अधिक प्रेरित हुआ है.

सच्ची करुणा केवल एक भावनात्मक उत्तर नहीं, पर कारणों के आधार पर एक दृढ़ प्रतिबद्धता है. इसलिए यदि वे नकारात्मक रूप से आचरण करें तो भी दूसरों के प्रति एक सच्चा करुणात्मक व्यवहार नहीं बदलता, निश्चित रूप से इस प्रकार की करुणा बिलकुल भी आसान नहीं है.

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